When Ahmad Shah Durrani went hunting in Pinjore (1765)

August 13, 20140 Comments

One of the most powerful men to have visited Pinjore and to have hunted in the forests of the Pinjore dun and the Morni hills was Ahmad Shah Durrani (Abdali) who visited the valley during his seventh invasion of India in 1764-65. Abdali halted at the garden in Pinjore while marching towards Delhi with his conquering army. This battle-hardened soldier was so taken up with the beauty of the ‘bagh’ (garden) and the surrounding forests that he decided to take a break and spent two long months in the area lost in poetry and hunting. This was so out of character for this tireless campaigner that his stay at Pinjore finds a special mention in the accounts of his campaign by most historians. The imperial army eventually made its way along the foothills of the Shivaliks and reached Karnal after a leisurely march.

A fairly detailed eye-witness account of Abdali’s seventh invasion is available in ‘Jang Namah’ written in Persian by Nur Muhammad, a Qazi (judge) of Gunjaba in Baluchistan. Qazi Nur Muhammad accompanied Mir Nasir Khan the ruler of Kalat as he marched into Panjab in the winter of 1764 to join the army of Ahmad Shah Durrani on a military expedition to punish the increasingly assertive Sikhs. Emboldened by the conquest of Sirhind in 1763 the Sikhs under the Bhangis had crossed the Indus and had extended their dominions to Multan and the Deras by the middle of 1764. Nur Muhammad was promised the post of the Qazi in Shikarpore or the Deras on return from the expedition as a reward for his writing an account of the Khan’s military exploits in the holy war with the Sikhs.

Khans of Kalat

Khan of Kalat (Khan-e-Qalat) was the title of the ruler of the erstwhile State of Kalat (modern Balochistan in Pakistan). Kalat was originally a Hindu Princely State and its Raja sought the services of Mir Qambar, a Baloch chieftain to fight off tribal incursions from Multan, Shikarpur and Upper Sind. Mir Qambar repressed the incursion and finding the Raja weak he took over the rule of Kalat and assumed the Title of ‘Vali’. The Mirs gradually grew more powerful and were now addressed as the Khans of Kalat.

Kalat, Capital of Balochistan, Charles Masson Esq. 1842

Kalat, Capital of Balochistan, Charles Masson Esq. 1842

Miri, Citadel of Kalat; Charles Masson Esq. 1842

Miri, Citadel of Kalat; Charles Masson Esq. 1842

Mir Muhammad Nasir Khan I (also known as Mir Noori Nasir Khan) was probably the most powerful of the Khans of Kalat who ruled for 45 years from 1749 to 1794. After an initial unsuccessful revolt against Ahmad Shah Durrani in 1758 he later became his most powerful ally and his Baloch Army fought alongside the Afghans of Abdali against the Persians, the Marathas and the Sikhs. The boundaries of the Khanate of Kalat under Nasir Khan I extended far beyond those of modern Balochistan and reached as far as the town of Karachi.

Ghazi Amir Nasir Khan Ahmad Zilli Baloch, Milqab Ya Imam Noori, Nasir Khan Amir, Balochistan (1749- 1794)

Ghazi Amir Nasir Khan Ahmad Zilli Baloch, Milqab Ya Imam Noori, Nasir Khan Amir, Balochistan (1749- 1794)

The Jang Namah was completed by the Qazi on his return to Gunjaba in June 1765. The Jang Namah was lost in obscurity till a copy ended up in the District Gazetteer Office of Quetta from where copies were prepared by Sardar Karam Singh in 1906. He published a summary of the same in Phulwari in 1929 that was noticed by the famous Sikh Historian Ganda Singh who was working as a researcher and a lecturer in the Sikh History Research Department at Khalsa College Chandigarh. Professor Ganda Singh then published a summary of the Jang Namah along with the original Persian text in 1939.

The historical significance of the chronicle in Persian can be gauged from the fact that it is the only historical account available of events like the desecration of the holy sarovar (pool) at the Golden Temple and the valiant last stand at the gates of the Temple by Baba Gurbakhsh Singh and his band of thirty Sikhs who battled the army of Afghans and Baluchis despite the impossible odds until they were cut down to the last man.

The Tramp’s current interest in the Jang Namah, however, lies in events less momentous. It was the account of Abdali’s stay at Pinjaur including the killing of a tiger that attacked Mir Nasir Khan in the surrounding forests that caught The Tramp’s attention and it was decided to reproduce the same for the readers. Professor Ganda Singh’s English translation of the Persian text was restricted to a brief summary and it was decided to get the full text translated. The task was easier said than done as Qazi Nur Muhammad wrote his account mostly in verse (in the form of a nazm) and not many scholars are alive this day who can understand this 250 year old Persian account. But Delhi is not called the City of Djinns for nothing. Miraculously enough there was a scholar * in one of the lost lanes of Old Delhi (‘Dilli’ of the Mughals) who could follow the verses written by the Qazi. The Urdu translation is reproduced for the readers along with the original Persian text.

Urdu translation of Qazi Nur Muhammad's account (in Persian) of Ahmad Shah Durrani's two month stay at Pinjore and the encounter with a tiger in the surrounding forests

Urdu translation of Qazi Nur Muhammad’s account (in Persian) of Ahmad Shah Durrani’s two month stay at Pinjore and the encounter with a tiger in the surrounding forests

The Urdu translation has also been reproduced in the Devnagri script for the benefit of those unfamiliar with the Urdu script.

जंग नामा १७६४-१७६५ (1764-1765)ई०(अहमद शाह दुर्रानी)

यह जंग नामा का एक हिस्‍सा है जो कि बादशाह अहमद शाह दुर्रानी के दौरे हुकूमत सन् १७६४-१७६५ (1764-1765) ई० में काजी नूर मौहम्‍मद ने अपने खूबसूरत अलफाज में नज्‍म की शक्‍ल में उनके उस वक्‍त को ब्‍यान किया। जब बादशाह अहमद शाह दुर्रानी अपनी फौज और शिकारी कुत्‍तों के साथ एक जंगल की तरफ रवाना हुए। और वहां एक बाग में पड़ाव डाला। बादशाह के साथ अपनी अफवाज और तमाम साजों सामान मौजूद था और जब बाग में पड़ाव डाला गया तो गुलो गुंचे ने तसलीम के लिए अपने सरो को झुका लिया। ऐसा मालूम होता था के बादशाह सलामत के लिए हर गुलों गुंचा आदाब बजा लाया है। अपने ही कांटों से अपने को जख्‍मी कर रहे थे बीद के पेड़। फौज के खौफ से कांपते हुए नजर आ रहे थें। बनिफ-शा के फूलों ने मानो अपने गले में रस्‍सी का फंदा डाल लिया हो और नरगिस के फूलों ने दरहम लुटाये। जब बाग को अपनी आमद पर इस तरह खुश देखा तो बादशाह ने भी दरहम लुटाये। और अपने नाम के सिक्‍कों से फूलों की नजर उतारी और जो थकान वो गमो गुस्‍सा था वो फूलों की ताजगी देखकर काफूर हो गया ऐसा मालूम होता था के जैसे चारों तरफ बहार का मौसम आ गया हो। हवा के चलने से बाग में मदधम-मदधम खुशबू फैल गयी और सूखे हुए पत्‍ते गिरने लगे मानों सोने के सिक्‍के खाक पर फैला दिये हों। तूस की शाख ने दूसरी शाख में से अपना सर बाहर निकाला तो कुछ परिंदों को इससे रोजी मिली। गुलाब के फूलों पर सरू ने अपना साया किया। बहता हुआ पानी मानो ऐसे खड़ा रहा जैसे किसी खादिम को अपने हमराह बादशाह खिदमत के लिए खड़ा रहने का हुक्‍म दे। हवा के झोंकों से पानी लहराने लगा। बाग में ऐसा मालूम होता था जैसे अनार की मिठास रच बस गयी हो। परिंदे ऐसे चहचहाने लगे के गोया बच्‍चे इधर से उधर दौड़ रहे हैं। इस नज्‍म के पढ़ने से दिमाग में सुकून उतर आया इसके अलफाज जहन को सुकून और जबान को शीरी कर रहे थे।

शायर ने नज्‍म में वहां का खाका ऐसा ब्‍यान किया है के गुलों गुंचा इस माहौल को देखकर हैरान व परेशान हो गये। मानो उनके पास ब्‍यान करने को अलफाज न रहे हों। हजरत सुलेमान जो कि एक नबी थे और चरिंद परंद उनके ताबा थे। हुद-हुद ने मानो सर पर ताज रख लिया हो। इस खुशगवार नजारे से लुत्‍फ अंदोज होते हुए फाख्‍ता ने भी जैसे बोलना सीख लिया हो। और खुदा की तारीफ में सरबा सजूद हों और इसकी जबान खुदा की तारीफ करते हुए ना थकती हो। और इस बाग की खुशबु जिंदगी के लिए रहबर लग रही थी। बुलबुल ने नगमा गाना शुरू किया। और इसने अपनी आवाज से सबको मदमस्‍त कर दिया। चरिंदो परिंद हर एक खुश व खुर्रम नजर आ रहा था। हर कोई खुदा की इस नेमत का शुक्रिया अदा कर रहा था। इस मनाजिर और ऐसे खुशगवार जगह पर फौज और बादशाह हर कोई खुश वो खुर्रम नजर आ रहा था। इस बाग में ऐशो इशरत में दो दिन गुजारकर तीसरे दिन वहां से कूच करने का प्रोग्राम बनाया लेकिन बादशाह और उसकी फौज दो महीने तक आस-पास ही भटकती रही। और दो महीने में इन्‍होंने दो मील का सफर भी तय नहीं किया। कभी बाग के पड़ाव के दायीं तरफ तो कभी बायीं तरफ, कभी आगे और कभी पीछे इस तरह पड़ाव डालते रहे। इस दरम्‍यान एक दिन बादशाह ने अपने तमाम दरबारियों और फौजियों को देहली की तरफ कूच करने का हुक्‍म दिया। तमाम सवार बादशाह के हुक्‍म से देहली की तरफ कूच करने के लिए आमादा हो गये। लेकिन इनका इरादा इस रास्‍ते की दलील नहीं था। इस सफर की खुशी में कुछ दिन वहीं बसर हुए खुदा से दुआ की के या बाराल्‍लाह इसका मालिक आबादों शाद रहे। और कुछ जगहों पर बादशाह ने अपनी बादशाहत के नमूने छोड़े।

 बादशाह के गुलामों का शिकार करना और एक शेर को मारना

एक दिन खान जमाशाह सवार अपने घोड़े पर सवार होकर शिकार को निकले इनके खास साथी और वफादार लोग खान साहब के पीछे-पीछे इस तरह रवाना हुए जैसे गडरिये के पीछे चौपाये चलते हैं। यहां तक के सफर करते हुए एक बियेबान और भयानक जंगल मेंपहुँच गये। इस बियेबान जंगल में हर तरह के जंगली जानवर थे। जैसे नीलगाय, बारासिंगा,हिरन, शेर वगैरह। निडर और दिलेर सवार बे खौफो खतर इस तरह जंगल में घूम रहे थे। बादशाह खान जमाशाह सवार का पूरा अमला आगे पीछे शिकार की तलाश में इधर-उधर दौड़ रहा था। इसी दरम्‍यान एक शेर अपनी खचार से निकला और जिस सवारी पर शाह जमा सवार थे उसको अपने निशाने पर लिया। करीब था के शेर शाह साहब पर हमला कर दे। खान साहब के अमले में से एक नौकर जो बहुत दिलेर, वो निडर और बहादुर था इसने महसूस किया के शेर कहीं खान साहब को अपनी दरिंदगी का शिकार न बना ले और खान साहब को कोई जबरदस्‍त जानी नुकसान ना पहुंचे। वो बहादुर नौजवान जिसके एक हाथ में खंजर और दूसरे हाथ में बंदूक थी अपने घोड़े से उतरा और एक बहादुर नौजवान ने इंतहाई जाबाजी और बहादुरी का मजाहेरा करते हुए बहुत तेजी से इस शेर को अपने निशाने पर लिया। और बंदूक से वार किया। शेर खाकों खूँ में लुढ़क गया और खान साहब की जान इस नौकर की होशियारी, फुर्ती और बहादुरी से बच गयी। बादशाह ने दुआओं से नवाजते हुए कहा हजारों साल जिंदा रहें ऐसे लोग जो अपनी जान की परवाह न करते हुए दूसरों को बचा लें। ऐ बहादुर नौजवां तू बहादुर भी है बानसीब भी है। जो लोग बाअदब होते हैं वो बानसीब भी होते हैं। खुदा तुझे सलामत रखे और तेरा नसीब बुलंद हो। खुदा तेरा नसीब बुलंद व बाला करे और अपनी तरफ से इसको इनामों इकराम से नवाजा और बहुत सारी दुआएं दी। बाकी फौज ने भी आफरी – आफरी के नारे बुलंद किये और सब लोग इसकी बहादुरी पर नाज करते हुए खुदा से इसके लिए दुआ करने लगे।


Qazi Nur Muhammad's account (in Persian) of Ahmad Shah Durrani's two month stay at Pinjore and the encounter with a tiger in the surrounding forests

Qazi Nur Muhammad’s account (in Persian) of Ahmad Shah Durrani’s two month stay at Pinjore and the encounter with a tiger in the surrounding forests

* The Tramp owes deep gratitude to Maulana Anis Ahmed Azad Qasmi, Nazim & Sheikh-ul-Hadees, Jamia Arabia Syedul Madaris for the translation of the Persian verses to Urdu. Maulana Anis Ahmed is an eminent scholar proficient in Arabic, Persian and Urdu languages and has authored a number of books on religion, language and poetry.

Filed in: History of Morni

About the Author ()

An environmental enthusiast who loves tramping through the hills in search of the picturesque.

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